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पहली संतान

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    लगभग बीस साल पहले मेरे नाना हार्ट अटैक की वजह से चल बसे थे , सारा खानदान सोग मना रहा था , जिसमें मेरी सबसे छोटी मौसी कुछ ज़्यादा ही दुखी थी। होगी ही , रोते-रोते वह मेरी छोटी बुआ से बार-बार यही दोहराए जा रही थी- “कभी छोटे बन कर पैदा नहीं होना चाहिए।” उस समय जो कि मैं बहुत छोटी थी , समझ नहीं सकी थी , आखिर मौसी ऐसा क्यों कह रही है जबकि सुन यह रखा था कि जो घर में सबसे छोटा होता है , उसे सबसे ज़्यादा प्यार मिलता है। अमूमन मिलता भी है क्योंकि परिवार में उससे छोटा कोई होता भी नहीं तो बाकी सदस्य उसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं और वह कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए हमेशा छोटा ही रहेगा। लग-भग हर ज़िम्मेदारी से बचता-बचाता। आज-कल आबादी पर नियंत्रण करने के लिए वैसे “ बच्चे दो ही अच्छे ”, “हम दो हमारे दो” जैसे स्लोगन पढती हूँ तो मन में ऐसे खयाल आने लगते हैं कि पिछ्ले ज़माने में लोग इतने बच्चे किस हिम्मत से पैदा कर लेते हैं ? शायद इसीलिए हमारे यहाँ गरीबी ज़्यादा है वगैरा-वगैरा। लेकिन एक दिन अचानक मेरे अब्बा की तबीयत खराब हुई तब मैं घर में नहीं थी , भाई काम पर गया था , बहन अपने घर म...

पैरासाइट

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🪱 🪱पैरासाइट : जिनको पता नहीं, बता दूं परासाइट को हिंदी ने परजीवी कहते हैं, यानी वे जीव जिनका अपना कोई जुगाड नहीं होता और फैलने के लिए यह किसी अन्य जीव का सहारा लेते हैं। आप इसको किसी भूत की तरह भी सोच सकते हैं जो किसी मनुष्य के अंदर प्रवेश कर, उसके द्वारा कोई भी काम करवा लेता है। वैसे पैरासाइट को विश्व का सबसे चतुर जीव माना जाता है और यह है भी। ठीक अपने उन कथित दोस्तों की तरह जिनकी दोस्ती हमारे अंदर बस जाती है और हम आश्रित जीव की तरह पूरी तरह उसके इशारों पर चलने लगते हैं। असल में आश्रित जीव को अपने अंदर पैरासाइट के होने का कभी अनुभव नहीं होता क्योंकि यह देह को जल्दी से कुछ खास हानि नहीं पहुंचाता लेकिन समय के साथ मनुष्य को खोखला ज़रूर कर देता है।  इतना ज्ञान बांटने का तात्पर्य बस यही है_ हमारे अंदर पैरासाइट होने का भले ही हमें पता ना चले लेकिन इतना ज़रूर ध्यान रखा जा सकता है कि हम किसी के लिए पैरासाइट न बनें😊

एक सफर ऐसा भी

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            सामान चेक, खाने के लिए,,, चेक, पानी,,, चेक, सैनिटाइजर चेक, तीनों के पास एक एक ट्रॉली बैग के साथ एक-एक बैकपैक था। घर से निकलते ही गेट के पास किसी पहचान वाले ने ऑटो रिक्शा रोक दिया, पूछा कहां छोड़ दूं, हमने कहा रेलवे स्टेशन। पूछ रहा था “गोआ जा रहे हो या ऊटी?” हमने हंस कर जवाब दिया शाह नेमत के यहां। वह खुश हुआ और हमारा समान उठाकर रिक्शे में एडजस्ट किया और हम निकल पड़े। रास्ते में बातें करते हुए के रहा था कि वह भी साल में दो बार लोगड जाता है ज़ियारत के लिए। लेकिन इस कोरोना के कारण दो साल से जा ही नहीं पाया। ऐसे ही एक दो किस्से सुनाए और कहने लगा जानते हो मेरी बीवी ने मुझसे शादी के लिए हां क्यों कही? क्योंकि मैं साल में दो बार शाह नेमत के यहां जाता हूं तो उसको भी साथ ले जाऊं। सुन कर यकीन नहीं हुआ। मगर वो जिस यकीन और जोश से कह रहा था उसे देख कर और यह सोच कर कि उस जगह के बारे में कोई झूठ क्यों बोलेगा, मानना ही पड़ा। स्टेशन आया और उसने समान उतरने में मदद की, मैंने पैसे दिए तो लेने से मना कर दिया और कहा की वहां मेरे लिए...

साथ..!

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           कुछ लोग राह दिखाते हैं, साथ चलने के वादे भी करते हैं। मगर जब बात सच में साथ देने की आती है तब अपनी अपनी मजबूरियां भी गिनाते हैं। जो हर बार झूठी नहीं होतीं। मगर चंद मजबूरियां ऐसी भी होती हैं जो टाली जा सकती हैं मगर उन्हें टालने का मन नहीं करता। कुछ मजबूरियां पैदा भी की जाती हैं ताकि बेकार के रिश्ते खत्म किए जा सकें। खास कर वह रिश्ते जो आपको कोई फायदा नहीं देते।           ज़रूरत है कि हम इन मजबूरियों पर नाराज़ होने के बजाए उन मजबूरियों की कद्र करें। अपने हिस्से का स्पेस हर कोई चाहता है। बिना आगे वाले की मर्ज़ी के आखिर हम कब तक एक तरफा रिश्ता निभाकर खुद को हर्ट करते रहेंगे? सच तो यह है कि हम रिश्तों को तोड़ने से नहीं बल्कि दिल को दुखाने से डरते हैं। यह असल में डर नहीं बल्कि हमारा भविष्य ही है जिसे हम टालते रहते हैं, जिसका सामना करने से हम डरते हैं। लेकिन क्या हो जब ऐसे सारे डर एक डरावने सपने की तरह सच हो जाएं?           यह ज़िंदगी का अनचाहा सच है। यही वह सच है जो हमारे सारे भ्रम तोड़ कर ह...

अब्बा

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आज फादर्स डे है ! सब अपने-अपने पिताजी, डैडी, पापा, अब्बा, अब्बू के फोटो के साथ उनकी तारीफ कर, सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे। मैंने भी स्टेटस लगाया। लेकिन ऐसे ही सोच रही थी कि हम दिखावा तो नहीं कर रहे। सोशल मीडिया ने हमें लाइफ एंजोय करने पर इतना मजबूर तो नहीं कर दिया। क्या हो अगर हम अपने माँ बाप से फोटो में दिखने जितना ही प्यार सच में करें तो? वे खुश नहीं हो जाएंगे? सब अपने पापा की इतनी तारीफ कर रहे थे तो मैंने भी सोचा कि मुझे अपने अब्बा की कौन सी बात की तारीफ करूं? इस बात की तारीफ करूं कि वे निस्वार्थ होकर लोगों की मदद करते थे? या इस बात की कि उन्होंने मुझे अपनी आज़ादी का एहसास कराया? मैं कोई झूठी तारीफ या सच्ची बुराई नहीं करती लेकिन वही लिखूंगी जो मैंने अनुभव किया। सच बताऊं तो मुझे याद नहीं कि अब्बा कभी हमें स्कूल छोडने या लेने आए हों? यह काम मेरे कोई चाचा या दुकान का कोई आदमी ही करता। शायद इसीलिए एक दिन स्कूल आते समय मैं खो गई थी। मुझे आज भी याद है मेरी खो जाने की उन्हें खबर तक नहीं थी। अब्बा अकसर व्यापार के सिलसिले में बाहर ही रहते। मैंने उन्हें कभी वक़्त पर खाना खाते नही...

We are a generation of broken hearts and broken people

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मैंने कहीं सुना था “We are a generation of broken hearts and broken people.” और यह बात मुझे छू गई। क्या सच-मुच हम अपने चेहरे पर झूठी मुस्कान सजाए फिर रहे हैं? क्या आज हमारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर होकर रह गई हैं? क्या हम सच में अपनी ज़िंदगी से नाखुश हैं? क्या हमारे पास जीने के लिए सच में कोई वजह नहीं है? क्या हर किसी का दिल टूटा हुआ ही है? और सब के दिल तोड कौन रहा है? हमारी आशाएं?  मुझे तो यह देख कर हैरानी होती है कि सोशल मीडिया में आज कल ट्रेंड बन गया है कि कम उम्र के बच्चे भी ऐसे-ऐसे वाक्यों और शायरी पर लिप-सिंग करके वीडियो बना रहे हैं। कभी तो लगता है कि क्या महज़ इस 13-14 साल के बच्चों को इस शेर का मतलब भी पता होगा? मज़ाक के तौर पर तो मैंने यह भी सोचा कि आखिर बेर्क-अप के बाद यह रसना पीते होंगे? लेकिन एक बात यह सोचनी चाहिये कि आखिर हमारी यह पीढी क्या कर रही है? आगे आनेवाली पीढी को अंजाने में यह कौन सा सबक सिखा रही है? मैं यह नहीं कहती कि सोशल मीडिया का गलत इस्ल्तेमान हो रहा है, लेकिन जैसा इस्तेमाल हम कर रहे हैं, क्या वह सही है? अलग-अलग गानों पर डांस करना तो ठीक है लेकिन...

आदिवासी कविता और स्त्री मानवाधिकार

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आदिवासी कविता और स्त्री मानवाधिकार प्रो.प्रतिभा मुदलियार एक ओर मनुष्य सभ्यता की ऊँचाइयाँ हासिल करता जा रहा है, तो दूसरी ओर अमानुषिकता की चरमसीमा पर भी पहूँचता जा रहा है। दहशत का काला साया तो सारे विश्व पर मंडरा रहा है। युद्ध की अलग चिंता भी है। भारत और उसके पड़ोसी देश तरह-तरह की हिंसा से ग्रस्त हैं। परिणाम बच्चे बेघर हो रहे हैं, बुढे बुजुर्ग बुढ़ापे के दर्द को झेल रहे हैं। निर्दोष लोग जेल और यातना शिविर में ठूँस दिए जा रहे हैं और न जाने कितनी औरतों की आबरू पर संकट गहरा रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के जीने के मूलभूत अधिकारों का हनन होता दिखाई दे रहा है। भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस नए युग में मनुष्य दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने में सफल होता दिखाई दे रहा है, फिर भी उसकी मुट्ठी से उसके अपने जीवन के अधिकार छूटते जा रहे हैं। यही कारण है कि दुनिया भर में आज मानवाधिकारों के संरक्षण की चिंता बढ़ गई है।  ऐसी स्थिति में साहित्य की प्रासंगिकता का मूलाधार भी यही है कि वह इस सामाजिक यथार्थ को पहचानने और मानव अधिकारों के प्रति जागरूकता को प्रसारित ...